रविवार, 31 जुलाई 2016

मेरा देश बदल रहा है...
किले दरक रहे हैं. तनाव बढ़ रहा है. पहले तनाव टीवी की रिपोर्टों तक सीमित रहता था. फिर एंकरिंग में संपादकीय घोल देने तक आ पहुंचा. जब उतने में भी बात नहीं बनी तो ट्विटर, फेसबुक, ब्लॉग, अखबार, हैंगआउट – जिसकी जहां तक पहुंच है, वो वहां तक जा कर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करने लगा.
जब मठाधीशी टूटती है, तो वही होता है जो आज भारतीय टेलीविज़न में हो रहा है. कभी सेंसरशिप के खिलाफ़ नारा लगाने वाले कथित पत्रकार – एक दूसरे के खिलाफ़ तलवारें निकाल के तभी खड़े हुए हैं जब अपने अपने गढ़ बिखरते दिखने लगे हैं. क्यों कि उन्हें लगता था कि ये देश केवल वही और उतना ही सोचेगा और सोच सकता है – जितना वो चाहते और तय कर देते हैं. लेकिन ये क्या ? लोग तो किसी और की कही बातों पर भी ध्यान देने लगे. किसी और की कही बातों पर भी सोचने लगे. और किसी और की कही बातों को सुनने –समझने के बाद, जब उन्हें अहसास हुआ कि आज तक जो देखते-सुनते आए उसका कोई और पक्ष भी है, तो सवाल भी पूछने लगे. बस्स. यही बुरा लग गया मठाधीशों को. हमसे कोई सवाल कैसे पूछ सकता है ? हम अभिव्य़क्ति की आज़ादी अपने लिए मांगते हैं, दूसरों के लिए थोड़े ही न. ब्लॉक करो सालों को. भक्त हैं. दलाल हैं. सांप्रदायिक हैं. राष्ट्रवादी हैं.
दुनिया भर में कत्ल-ए-आम मचा हुआ है. भारत छोड़ के हर मुल्क के पत्रकारों को पता है कि कौन मार रहा है, किसको मार रहा है, किस लिए मार रहा है. सिर्फ भारत का टीवी इस बात पे बहस करता है कि आतंकवाद का धर्म नहीं होता बजाए इसके कि आतंकवाद से उस धर्म को कैसे बचाया जाए. ‘चंद भटके हुए नौजवानों’ के जुमले की आड़ लेने वाले वही सारे पत्रकार, दादरी कांड के बाद पूरे हिंदू समाज को हत्यारा, आतंकवादी, क्रूर और भारत को असहिष्णु का सर्टीफिकेट देने में पल भर की देर नहीं लगाते. लेकिन किला तब दरकता है जब देश असहिष्णुता के नाम पे अवॉर्ड वापसी को ड्रामा मानता है – और इनटॉलरेंट होने की पत्रकारों और संपादकों की उपाधि कुबूल करने से इनकार कर देता है.
कश्मीर में पत्थर चलते हैं. पैलेट गन चलती है. हर बार की तरह कुछ पत्रकार अलगाववादियों के दफ्तरों तक जाते हैं. उनकी बाइट लाते हैं. और बता देते हैं कि कश्मीर तो आज़ादी चाहता है. बुरहान वानी की मां भले बेटे को जिहाद की भेंट चढ़ा कह रही हो, कुछ पत्रकार इसे सेना की ज़्यादती साबित करने में जुटे रहते हैं. लेकिन किले तब दरकते हैं जब गुरेज़ में रहने वाला महबूब बेग, टीवी कैमरे पर भारत माता की जय का नारा लगा देता है, हिंदुस्तान ज़िंदाबाद कहता है और आज़ादी की जंग को बकवास क़रार देता है. क्यों कि देश उस समय उन पत्रकारों से पूछने लगता है कि कश्मीर क्या सिर्फ अलगाववादियों की गलियों में बसता है जनाब ?
गौरक्षा कथित लिबरल पत्रकारों के लिए सबसे बड़ा चुटकुलेबाज़ी का विषय है. बेशक गौरक्षा के नाम पर जो घटनाएं कई जगह घटी हैं, वो माफी के काबिल नहीं हैं. ऐसे तत्वों से कानून को सख्ती से निबटना चाहिए. लेकिन किले तब दरकते हैं जब लोग पूछने लगते हैं कि कुत्ता-रक्षा के लिए तो आपने जान की बाज़ी लगा दी थी. घोड़ा-रक्षा के लिए आप चौराहे पर घोड़े की मूर्ति लगा दिए जाने तक लड़े थे. गैया का क्या कुसूर है? उसके लिए भी लड़िए न! आप लड़ लेते उसके लिए तो शायद ये गली गली गौरक्षा दल की दुकानें न चल पातीं. आपकी मां ने भी तो कभी चूल्हे से पहली रोटी गाय के लिए ही उतारी होगी! चलिए उसके लिए न कीजिए, अपने अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक वाले फेवरेट गेम में इसी बात के लिए गाय को कानूनी हक़ दिला दीजिए कि देश का बहुसंख्यक समाज उसको पूजता है.
झगड़ा राष्ट्रवाद या सेकुलरिज़्म का नहीं है. मसला किसी सरकार के पक्ष या सरकार के विरोध का भी नहीं है. दर्शकों और पाठकों को बेवकूफ़ बनाने के लिए उस पर राष्ट्रवाद बनाम सेकुलरवाद का मुलम्मा वैसे ही चढ़ाया गया, जैसे आज तक हर चीज़ पर चढ़ाया जाता रहा है. सेकुलरिज़्म वाला थोड़ा कमज़ोर पड़ता दिखे तो दलितिज़्म का चढ़ा दो. बाबा साहेब अंबेडकर जब मुंबई में सूट बूट पहन कर निकलते थे, तो जो टिप्पणियां उन पर की गईं – वो स्थिति आज है क्या? और जो दलित उत्थान अभी तक हुआ है – उस तक आने के लिए इन टीवी पत्रकारों ने अपनी रिपोर्टों से कितने ऐसे आंदोलन खड़े किए जिससे दलितों की हालत बेहतर हुई हो? सिवा इसके कि इन्होंने हमेशा दलित और सवर्ण समाज के बीच की खाई को गहरा ही किया. किले तब दरकने लगे जब लोगों ने पूछना शुरू कर दिया – कभी अखबार में हैडलाइन छापते हो क्या – ब्राह्मण युवक की मौत. या क्षत्रिय युवक की मौत. या बनिया युवक की मौत. अगर नहीं तो लूटपाट, चोरी चकारी, डकैती, हत्या, फिरौती में जा के जाति का एंगल क्यों तलाशते हो भाई ? तब आपकी तटस्थता कहां चली जाती है ?
निष्पक्षता और तटस्थता, दो परिस्थितियां हैं. आंख-नाक-कान बंद होने का ड्रामा कीजिए. अपनी पसंद के तथ्य (किसी भी एक तरफ़ के) अपनी च्व़ॉइस के कवर में लपेट कर दर्शक को दीजिए और तटस्थ बने रहिए. या फिर आंख-नाक-कान खुला रखिए और कहिए कि देख-सुन-सोच-समझ कर बता रहा हूं. जो सही है – उसके साथ ताल ठोक के खड़ा हूं, इसलिए मैं तटस्थ नहीं – निष्पक्ष हूं.
और पत्रकार निष्पक्ष हो या तटस्थ, ये जानने-समझने के लिए हमें किसी अमेरिकी या ब्रिटिश पत्रकार का उदाहरण नहीं चाहिए (BBC और CNN दोनों ‘PERSPECTIVE’ के लिए दुनिया भर में कुख्यात हैं, इसके हज़ारों उदाहरण हैं). राजा राम मोहन राय, लाला लाजपत राय, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी ने पर्याप्त पत्रकारिता की है। भारतीयों को, भारतीय परिस्थिति में, भारत के हित की पत्रकारिता सिखाने के लिए वो काफ़ी है.

मेरा देश बदल रहा है...
किले दरक रहे हैं. तनाव बढ़ रहा है. पहले तनाव टीवी की रिपोर्टों तक सीमित रहता था. फिर एंकरिंग में संपादकीय घोल देने तक आ पहुंचा. जब उतने में भी बात नहीं बनी तो ट्विटर, फेसबुक, ब्लॉग, अखबार, हैंगआउट – जिसकी जहां तक पहुंच है, वो वहां तक जा कर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करने लगा.
जब मठाधीशी टूटती है, तो वही होता है जो आज भारतीय टेलीविज़न में हो रहा है. कभी सेंसरशिप के खिलाफ़ नारा लगाने वाले कथित पत्रकार – एक दूसरे के खिलाफ़ तलवारें निकाल के तभी खड़े हुए हैं जब अपने अपने गढ़ बिखरते दिखने लगे हैं. क्यों कि उन्हें लगता था कि ये देश केवल वही और उतना ही सोचेगा और सोच सकता है – जितना वो चाहते और तय कर देते हैं. लेकिन ये क्या ? लोग तो किसी और की कही बातों पर भी ध्यान देने लगे. किसी और की कही बातों पर भी सोचने लगे. और किसी और की कही बातों को सुनने –समझने के बाद, जब उन्हें अहसास हुआ कि आज तक जो देखते-सुनते आए उसका कोई और पक्ष भी है, तो सवाल भी पूछने लगे. बस्स. यही बुरा लग गया मठाधीशों को. हमसे कोई सवाल कैसे पूछ सकता है ? हम अभिव्य़क्ति की आज़ादी अपने लिए मांगते हैं, दूसरों के लिए थोड़े ही न. ब्लॉक करो सालों को. भक्त हैं. दलाल हैं. सांप्रदायिक हैं. राष्ट्रवादी हैं.
दुनिया भर में कत्ल-ए-आम मचा हुआ है. भारत छोड़ के हर मुल्क के पत्रकारों को पता है कि कौन मार रहा है, किसको मार रहा है, किस लिए मार रहा है. सिर्फ भारत का टीवी इस बात पे बहस करता है कि आतंकवाद का धर्म नहीं होता बजाए इसके कि आतंकवाद से उस धर्म को कैसे बचाया जाए. ‘चंद भटके हुए नौजवानों’ के जुमले की आड़ लेने वाले वही सारे पत्रकार, दादरी कांड के बाद पूरे हिंदू समाज को हत्यारा, आतंकवादी, क्रूर और भारत को असहिष्णु का सर्टीफिकेट देने में पल भर की देर नहीं लगाते. लेकिन किला तब दरकता है जब देश असहिष्णुता के नाम पे अवॉर्ड वापसी को ड्रामा मानता है – और इनटॉलरेंट होने की पत्रकारों और संपादकों की उपाधि कुबूल करने से इनकार कर देता है.
कश्मीर में पत्थर चलते हैं. पैलेट गन चलती है. हर बार की तरह कुछ पत्रकार अलगाववादियों के दफ्तरों तक जाते हैं. उनकी बाइट लाते हैं. और बता देते हैं कि कश्मीर तो आज़ादी चाहता है. बुरहान वानी की मां भले बेटे को जिहाद की भेंट चढ़ा कह रही हो, कुछ पत्रकार इसे सेना की ज़्यादती साबित करने में जुटे रहते हैं. लेकिन किले तब दरकते हैं जब गुरेज़ में रहने वाला महबूब बेग, टीवी कैमरे पर भारत माता की जय का नारा लगा देता है, हिंदुस्तान ज़िंदाबाद कहता है और आज़ादी की जंग को बकवास क़रार देता है. क्यों कि देश उस समय उन पत्रकारों से पूछने लगता है कि कश्मीर क्या सिर्फ अलगाववादियों की गलियों में बसता है जनाब ?
गौरक्षा कथित लिबरल पत्रकारों के लिए सबसे बड़ा चुटकुलेबाज़ी का विषय है. बेशक गौरक्षा के नाम पर जो घटनाएं कई जगह घटी हैं, वो माफी के काबिल नहीं हैं. ऐसे तत्वों से कानून को सख्ती से निबटना चाहिए. लेकिन किले तब दरकते हैं जब लोग पूछने लगते हैं कि कुत्ता-रक्षा के लिए तो आपने जान की बाज़ी लगा दी थी. घोड़ा-रक्षा के लिए आप चौराहे पर घोड़े की मूर्ति लगा दिए जाने तक लड़े थे. गैया का क्या कुसूर है? उसके लिए भी लड़िए न! आप लड़ लेते उसके लिए तो शायद ये गली गली गौरक्षा दल की दुकानें न चल पातीं. आपकी मां ने भी तो कभी चूल्हे से पहली रोटी गाय के लिए ही उतारी होगी! चलिए उसके लिए न कीजिए, अपने अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक वाले फेवरेट गेम में इसी बात के लिए गाय को कानूनी हक़ दिला दीजिए कि देश का बहुसंख्यक समाज उसको पूजता है.
झगड़ा राष्ट्रवाद या सेकुलरिज़्म का नहीं है. मसला किसी सरकार के पक्ष या सरकार के विरोध का भी नहीं है. दर्शकों और पाठकों को बेवकूफ़ बनाने के लिए उस पर राष्ट्रवाद बनाम सेकुलरवाद का मुलम्मा वैसे ही चढ़ाया गया, जैसे आज तक हर चीज़ पर चढ़ाया जाता रहा है. सेकुलरिज़्म वाला थोड़ा कमज़ोर पड़ता दिखे तो दलितिज़्म का चढ़ा दो. बाबा साहेब अंबेडकर जब मुंबई में सूट बूट पहन कर निकलते थे, तो जो टिप्पणियां उन पर की गईं – वो स्थिति आज है क्या? और जो दलित उत्थान अभी तक हुआ है – उस तक आने के लिए इन टीवी पत्रकारों ने अपनी रिपोर्टों से कितने ऐसे आंदोलन खड़े किए जिससे दलितों की हालत बेहतर हुई हो? सिवा इसके कि इन्होंने हमेशा दलित और सवर्ण समाज के बीच की खाई को गहरा ही किया. किले तब दरकने लगे जब लोगों ने पूछना शुरू कर दिया – कभी अखबार में हैडलाइन छापते हो क्या – ब्राह्मण युवक की मौत. या क्षत्रिय युवक की मौत. या बनिया युवक की मौत. अगर नहीं तो लूटपाट, चोरी चकारी, डकैती, हत्या, फिरौती में जा के जाति का एंगल क्यों तलाशते हो भाई ? तब आपकी तटस्थता कहां चली जाती है ?
निष्पक्षता और तटस्थता, दो परिस्थितियां हैं. आंख-नाक-कान बंद होने का ड्रामा कीजिए. अपनी पसंद के तथ्य (किसी भी एक तरफ़ के) अपनी च्व़ॉइस के कवर में लपेट कर दर्शक को दीजिए और तटस्थ बने रहिए. या फिर आंख-नाक-कान खुला रखिए और कहिए कि देख-सुन-सोच-समझ कर बता रहा हूं. जो सही है – उसके साथ ताल ठोक के खड़ा हूं, इसलिए मैं तटस्थ नहीं – निष्पक्ष हूं.
और पत्रकार निष्पक्ष हो या तटस्थ, ये जानने-समझने के लिए हमें किसी अमेरिकी या ब्रिटिश पत्रकार का उदाहरण नहीं चाहिए (BBC और CNN दोनों ‘PERSPECTIVE’ के लिए दुनिया भर में कुख्यात हैं, इसके हज़ारों उदाहरण हैं). राजा राम मोहन राय, लाला लाजपत राय, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी ने पर्याप्त पत्रकारिता की है। भारतीयों को, भारतीय परिस्थिति में, भारत के हित की पत्रकारिता सिखाने के लिए वो काफ़ी है.

शनिवार, 28 मई 2016

दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री को पत्र

माननीय श्री सत्येंद्र जैन ,
स्वास्थ्य मंत्री , दिल्ली सरकार

विषय : कलावती सरण अस्पताल मे छोटी सी सर्जरी के लिए समय

महोदय, नमस्कार, एक छोटी सी बच्ची है नंदिनी, उम्र 11 माह ! समस्या : जन्म से होठ कटा हुआ !

श्री मान जी, इस बच्ची का जन्म एक निजी अस्पताल मे जून 2015 मे हुआ था , जन्म से ही बच्ची की नाक ने नीचे होठ कटे हुए हैं ! उस समय उस अस्पताल की डॉक्टर ने ही सलाह दिया था कि आप कलावती सरण अस्पताल चले जाइए , वहाँ पर इसकी छोटी सी सर्जरी कर देंगे तो यह ठीक हो जाएगा !



इस आशय के साथ की बच्ची का इलाज हो जाएगा , तो 28 जुलाई 2015 को OPD मे रजिस्ट्रेशन
करवा लिया ! कुछ इलाज , जाँच और जाँच रिपोर्ट इन तीनो ने मिलकर मध्य फ़रवरी 2016 तक का समय लिया ! इसके बाद जब सब कुछ ठीक रहा तो डॉक्टर साहब ने बोल दिया कि अब आप 3 महीने बाद आना ! और अब जब आज दिनांक 28 मई 2016 को उन डॉक्टर साहब से मिलने गये तो उन्होने फिर से अगले 3 महीने बाद आने की तिथि बताई है !

तिथि नहीं बल्कि अपना मोबाइल नंबर दिया कि 3 महीने बाद फ़ोन करके पूछ लेना कि कब आना है ! अर्थात 3 माह बाद भी यह सुनिश्चित नहीं है कि इस बच्ची की सर्जरी होगी !

आपसे विनम निवेदन है कि आप दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री होने के नाते यह जवाब देने का कष्ट करेंगे कि आख़िर इस प्रक्रिया मे लगभग 1 वर्ष हो गये और नतीज़ा ज़ीरो ! 

आप यदि उस बच्ची के बारे मे यदि अच्छा सोचते हैं तो इस ई- मेल siddhnath121@yahoo.com  पर लिख सकते हैं , मैं इस बच्ची के पिता तक आपकी बात पहुँचा दूँगा ! धन्यवाद !!! इस इंतज़ार मे कि आप जवाब ज़रूर देंगे !

This is reply from PS to Mr Satender jain (Swasth Minister):


आपका
सिद्धू जौनपूरिया

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

बिहार के बेटा , बिहार की बेटी

मैं बिहार बोल रहा हूँ , आज कल मुझे कुछ लोग बदनाम करने की कोशिस कर रहे हैं सिर्फ़ चंद वोटों की खातिर ! देश विरोधियों और आतंकवादियों को वोट के लालच में या स्व-स्वार्थ सिद्धि के चक्कर मे महिमा मंडित कर रहे हैं , उन्हें बिहार का बेटा या बिहार की बेटी बता रहे हैं ! यह सच्चाई नहीं है , मुझे मेरे बेटे और बेटियों पर फख्र है लेकिन उनपर नहीं जो इन दिनों चर्चा मे हैं ! मेरे बच्चों के बारे मे जानना हो तो इन नामों को देखो :

आर्यभट्ट, गौतम बुद्ध, महावीर , अशोक, चाणक्य , चंद्रगुप्त , गुरु गोविंद सिंह, शेर शाह सूरी , वीर कुंवर सिंह , बाबू कुंवर सिंह , गोनू झा , राजेंद्र प्रसाद , श्री कृष्णा सिंह , जयप्रकाश नारायण ,स्वामी सहजनांद सरस्वती, रामवृक्ष बेनीपुरी ,राधानंदन झा, रामधारी सिंह दिनकर, विद्यापति, देवकी नंदन खत्री , MJ  अकबर, रविश कुमार, बिधान चंद्र रॉय, बिस्मिल्लाह ख़ान, आचार्य शिवपूजन सहाय, जानकी बल्लभ शास्त्री, शारदा सिन्हा, अशोक कुमार , तपन सिन्हा , सर अनिरूद्ध जगन्नाथ, सिऊसागर रामगुलाम (मारीशश के प्रधानमंत्री ), गिरिजा प्रसाद कोइराला (नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री ) जगजीवन राम, प्रीतिश नंदी, प्रकाश झा, दलेर मेहंदी, मीका सिंह, उदित नारायण !

ये सिर्फ़ चंद नाम हैं , ऐसे ही लाखों बेटे बेटियाँ हैं मेरे जिनपर मुझे और पूरी दुनिया को गर्व है ! मेरे मिट्टी मे पूरे दुनिया को सत्य और अहिंसा मे मार्ग पर चलाने और चलाने वाले जन्म लिए तो दुनिया को एक आदर्श राष्ट्र का स्वरूप देने वाला भी जन्मा, गुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ने वाले भी जन्मे तो संगीत से दुनिया को मो लेने वाले भी जन्मे, ख़तरे मे पड़े लोकतंत्र को बचाने वाले भी जन्मे, अच्छे पत्रकार भी !


इसलिए हे मूर्ख पुत्रों वोट के लालच मे मुझे बदनाम मत करो ! आप लोगों से हाथ जोड़कर निवेदन है !

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

भगत सिंह को इंसाफ़ मिलेगा

23 मार्च 1931 को लाहोर मे भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरु को फाँसी दी गयी थी ! और आज 85 बरस बाद उसी लाहोर मे यह कहानी अचानक फिर से उभर कर आती है कि भगत सिंह दोषी थे या निर्दोष !

जिस तरह की मीडीया रिपोर्ट्स सामने आई हैं उनसे तो यह संदेह उभर ही जाता है कि फनस्ी ग़लत तरीके से , ग़लत व्यक्ति के द्वारा दी गयी ! पाकिस्तान की भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन द्वारा एक याचिका दायर की गई थी कि जिस मुक़दमे मे उन्हें फाँसी की सज़ा सुनाई  गयी थी उसकी FIR की कॉपी उन्हें दी जाए ! यह याचिका  इम्तियाज़ रशीद कुरेशी फाउनडिंग चेयरमैन  भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन द्वारा दाखिल की गयी थी , जिसमे उन्होने दलील दी थी कि शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ये तीनों ही अविभाजित भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे थे , उन्हें ग़लत तरीके से फाँसी दी गयी थी, भगत सिंह को अपना पक्ष भी नहीं रखने दिया गया था , इसलिए इस केस की फिर से सुवाई की जाए , इसके अलावा यह राष्ट्रीय सम्मान का भी मामला है क्योंकि जिन्ना ने भी उन्हे दो बार श्रद्धांजलि अर्पित की थी !

मीडीया रिपोर्ट्स के मुताबिक इम्तियाज़ रशीद कुरैशी ने यह भी दलील दी कि सरदार भगत सिंह के केस की सुनवाई उस समय जिस ट्रिब्यूनल ने की थी , उसका गठन को ब्रिटिश पार्लियामेंट ने मंज़ूरी नही दी थी जिसकी वजह से वह ट्रिब्यूनल असंवैधानिक हो गयी थी ! उनके डेथ वारंट की तारीख भी एक्स्पायर हो चुकी थी , बाद मे जिस रजिस्ट्रार ने नया डेथ वारंट जारी किया था , वह सक्षम अधिकारी नहीं था , और सबसे बड़ी बात कि जिस पुलिस अधिकारी सानड़र्स की हत्या के जुर्म मे उन तीनों को फाँसी दी गयी थी उसकी FIR मे सरदार भगत सिंह का नाम ही नहीं था !


तो कैसे .. कैसे दुनिया के इतने बड़े बैरिस्टर जवाहर लाल नेहरू और मोहनदास करमचंद गाँधी  इन बारीकियों को समझ नही पाए ! केस की सुनवाई के दौरान इन मुद्दों को नहीं उठाया ! मुझे तो शक है कि कहीं सुभाष चंद्र बोस से पहले सरदार भगत सिंह भी तो किसी षड्यंत्र का शिकार तो नहीं हो गये ! हो जो भी देखना रोचक होगा की पाकिस्तान की अदालत क्या 85 बरस बाद भी उन सिपाहियों को न्याय दिला पाती है ! यदि हाँ .... तो कई संभ्रांत चेहरों के पीछे छिपी कालिख उजागर हो जाएगी !

गुरुवार, 14 जनवरी 2016

पंजाब का उद्धार केजरी करेंगे ?

 14 जनवरी को पंजाब मे माघी मेला मुक्तसर मे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एक चुनावी सभा को संबोधित कर रहे थे ! केजरीवाल ने क्या कुछ कहा , देखते हैं  आम आदमी पार्टी  के ट्विटर हैंडल की ज़ुबानी :


अज्ञात  स्रोत से 1 करोड़ के चंदे की जानकारी सभी को है , तथा दिल्ली मे 526 करोड़ के प्रचार बजट को भी सब जानते हैं ! यह भी जानते हैं कि दिल्ली सरकार के विज्ञापन के अधिकार मनीष सिसोदिया के करीबियों को दिया गया था !



लोग यह भी जानते हैं कि दोनो हाथ जोड़कर नितिन गडकरी से माँफी माँगी थी !



जिन लोगों को यह दिव्य ज्ञान आप दे रहे थे , 2 दिन पहले उन्हीं पर यह तोहमत लगाई थी कि पंजाबी लोग अपने लड़के और लकड़ियों मे भेद भाव करते हैं !




 यही बात आपने दिल्ली मे भी कही थी , जब चुनाव शीला दीक्षित के खिलाफ लड़ रहे थे , बाद मे उन्हीं के भ्रष्ट करीबी अधिकारियों को बचाने मे जुट गये !



 जब खुद ही इतने गुंडे और बआउन्सर पाल रखे हैं तो किसी से क्यों डरना ! याद ना हो तो तालकटोरा स्टेडियम की घटना याद कर लीजिए जहाँ पर आई लड़कियों के साथ बदतमीज़ी करते हुए कैमरे के सामने पकड़े गये थे ! और यदि इससे भी विश्वास ना हो तो उस सम्मेलन को याद कर लीजिए जिसमे प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव तथा पंकज पुष्कर आदि को घसीट कर बाहर निकाल दिया गया था !



 खुद के मंत्री तक को तो कुछ सीखा नहीं पाए जिसमे अपनी पत्नी को कुत्ते से कटवाए , और उस पर हुई कार्यवाही को यह कहकर खारिज कर देना कि मोदी की पुलिस उनके विधायकों की जाँच बड़ी तीव्रता के क्यों करना चाह रही है !



 आपके घर के सामने दिल्ली के स्कूलों के शिक्षक अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण तरीके से जब प्रदर्शन कर रहे थे तो आपने उन्हें अपनी पलकों पर नहीं बिठाया था !


ऐसा भी तो हो सकता है कि सत्ता के लालच मे नेताओं ने ही ये कर्म-कांड किए होंताकि लोगों की भावनाओं को खुरचा जाए और फिर सरकार के उपर लांछन लगाकर अपना उल्लू सीधा कर लिया जाय !

यही डॉयलॉग आपने शीला दीक्षित जी के लिए भी इस्तेमाल किया था ! परिणाम क्या हुआ , आप मुख्यमंत्री बने और शीला जी राज्यपाल ! हिसाब बराबर !!!


ये वही रिश्ता है जो केजरीवाल और लालू प्रसाद यादव के बीच है !


यह क्यों मान लें , शहीद मोहन चंद शर्मा को आपलोगों ने ही अपराधी घोषित किया था , और बतला हाउस कांड मे मारे गये आतंकवादियों के प्रति अपनी सच्ची श्रद्धा व्यक्त की थी ! बात यहीं रुक जाती तो शायद यह मान लेते कि एकाध ग़लती तो हो ही जाती है लेकिन जब आपने इशरत जहाँ जैसे फिदायीन आतंकवादी को भी विक्टिम कह दिया सिर्फ़ इसलिए की कुछ मुस्लिमों का वोट आपको मिल जाएगा ! तो वहाँ पर तो फिर....

गजेंद्र ने आपकी सभा के सामने ही आत्महत्या की थी , आप लोगों ने सिर्फ़ उसका तमाशा बनाया ! मैं यह तो नहीं जानता कि उसमे आपकी कोई शाजिश थी या नहीं , लेकिन लापरवाही ज़रूर थी ! और जिस मुआवज़े की बात कर रहे हैं दिल्ली मे किसानो को  तो उसकी भी हक़ीक़त सब जानते हैं , लोगों को पोस्ट डेटेड चेक़ दिया गया था !


प्याज घोटाला , विज्ञानपन प्रसारणचीनी घोटाला , आटो परमिट घोटाला यह सब खेल खेल मे ऐसे ही हो गया !

और अंत मे : जिस किसी को  अब भी लगता है केजरीवाल सादगी से काम कर रहे हैं तो यह देखिए शायद अभी बढ़ी हुई तनख़्वाह मे जुगारा मुश्किल है :